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Aap Ho Roobaru


आप हो रूबरू

भले हो शब्द और पन्क्तिया की बौछार,
भले हो गीतों और ग़ज़लों की गूंज,
बस कुछ ख़ामोशी है काफ्ही, जब आप हो रूबरू ।

देखे दूर-दर्शी तास्वीरे या चित्रों का हार,
बस एक झलक है काफ्ही, जब आप हो रूबरू ।

राह बहुत उट-पट्तंग है, और राही मंजिल बहुत दूर,
बस एक हसीन राहबर है काफ्ही, अगर हो आप रूबरू ।

ये क्या हूआ महसूस , या है कोई कवी का ब्रह्म,
बस एक स्पर्श ही है काफ्ही, जब आप हो रूबरू ।

शायद जुदाई मंज़ूर हो दिन, साल, या सारा दौर,
बस एक पलक ही है काफ्ही, जब आप मिले रूबरू ।

(NOTES: A poem I wrote for Palak on her birthday (Apr 24, 2012))

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